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म्यूजिक माइस्ट्रो नौशाद अली के अनजाने किस्से...

Updated: May 20


"तुम क्या चाहते हो? 'घर' या 'मौसिकी'? 15 साल के एक लड़के को उसके पिता ने यह सवाल किया। "घर आप को मुबारक।" उस लड़के ने अपने पिता को यह जवाब दिया। दरअसल वह एक दरबार में मुंशी था और मुंबई के लिए रवाना हो रहा था तब उस लड़के के पिता ने उससे यह सवाल किया। यह लड़का कोई और नहीं बल्कि संगीत निर्देशक नौशाद अली थे जिन्होंने फिल्मी दुनिया में इतिहास रचा था। संगीत उनका जुनून था। उनको 67 फिल्मो के बेहतरीन संगीत का श्रेय जाता है। 26 सिल्वर ज्युबिली , 8 गोल्डन ज्युबिली और 5 डायमोंड ज्युबिली। "आंठवा सूर" के ये महान संगीत निर्देशक। नौशाद अली  हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। पहली फिल्म में संगीत देने के 64 साल बाद तक वो अपना जादू बिखेरते रहे। लेकिन इसके बावजूद नौशाद ने केवल 67 फिल्मों में ही संगीत दिया। उन्होने पहली बार स्वतंत्र रूप से 1940 में 'प्रेम नगर' में संगीत दिया और उनकी अपनी पहचान बनी 1944 में प्रदर्शित हुई 'रतन' से । यहीं से शुरू हुआ उनकी कामयाबी का सफर।

4 मई 2006 में म्यूजिक माइस्ट्रो नौशाद ने अमर गीतों को पीछे छोड़ते हुए इस दुनिया को छोड़ दिया था। धीरू मिस्री ने इस मौके पर अपनी यादों के पिटारे में से उनके बारे में कुछ जानी अनजानी बातों का एक अवसर बयान किया है। उस वक्त "बैजू बावरा" रजत जयंती मनाई जा रही थी और नौशाद अली रोते हुए दादर के ब्रॉडवे सिनेमा की बालकनी में गए। यह देखकर निर्देशक विजय भट्ट ने उनसे पूछा , "नौशाद साहब, हमारी रजत जयंती को खुशी से मनाने के बजाय आप इतना भावुक क्यों हो गए?"


इसका जवाब देते हुए नौशाद ने जहाँ वो इतने सालों से संघर्ष कर रहे थे उस सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा "भट्ट साहब, इस सड़क को पार करने में मुझे 16 साल लग गए।" ऐसी महान हस्ती को सलाम जिन्होंने मोहम्मद रफी, सुरैया, उमादेवी और कई को भारत के सुनहरे पर्दे पर पेश किया।