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क्या रंग लाएगा ट्रंप और मोदी का दोस्ताना....


भारत के ज्यादातर नागरिक जिस देश मे जाने का सपना देखते हैं, उस देश का नाम है अमेरिका... अमेरिका की सरकार और भारत की सरकार के बीच जितने गहरे रिश्ते नहीं है, उससे ज्यादा गहरे रिश्ते हिंदुस्तान के लोगों ने अमेरिका के साथ बना लिए हैं, और इसमें दोनों देशों की सरकारों की कोई सीधी दखल अंदाजी नहीं है। अमेरिका और भारत के बीच कैसे संबंध स्थापित हुए उसका एक छोटा सा उदाहरण है देश के लाखों छात्र जो अमरीका में पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के बाद H-1वीज़ा लेकर अमेरिका में ही सेटल हो जाते हैं और वहां पैसे कमा कर हिंदुस्तान भेजते हैं। अमेरिका ऐसे लोगों को ही H-1 वीजा देता है, जो उनके क्षेत्र में काबिल हो और जिन लोगों की अमेरिका की कंपनी को जरूरत है। सन 2018 में अमेरिका की संस्था ने आंकड़ा दिया था कि अमेरिका में H- 1 B विजा वाले 4,19,637 लोग हैं। जिसमें से 3,09,986 भारतीय हैं। यानी कि अमेरिका में रहने वाले वीजा धारकों में से 73.9% H-1 B विजा भारतीयों के पास है। अमेरिका की कई सारी कंपनियों पर भारतीयों का दबदबा है। यानी हम यह कह सकते हैं कि भारतीयों के बिना अमेरिका की कंपनियां बिना रीढ़ की हड्डी बन जाती है। प्रेसिडेंट ट्रम्प जब पहली बार चुनाव जीते थे,उन्होंने चुनाव प्रचार में अमेरिका फर्स्ट का नारा दिया था। मतलब था कि चुनाव जीतने के बाद जो लोग अमेरिका के नागरिकों का हक और नौकरियां छीन रहे हैं, उन्हें वापस उनके देश भेज दिया जाएगा। प्रेसिडेंट ट्रंप चुनाव जीत गए,और प्रेसिडेंट बनने के बाद जो हकीकत उन्हें समझ में आई वो यही थी कि बिना भारतीयों के अमेरिका का काम चलने वाला नहीं है। शुरुआत में ट्रंप ने h1b पॉलिसी को ठोस बनाने की कोशिश की, लेकिन अमेरिका की ही टॉप मोस्ट 50 जितनी कंपनियों ने ट्रम्प को पत्र लिखकर h1b वीजा की पॉलिसी में बदलाव और देश में आने वाले होशियार भारतीय टेक्नोक्रेट को रोकने की सरकार की नीति के खिलाफ अपना रोष जताया था। अमरीका की ग्राउंड रियालिटी यह है कि अगर प्रेसिडेंट ट्रंप अमेरिका में भारतीयों को आने से रोकेंगे तो अमेरिका की कंपनियां भारत में अपनी शाखाएं शुरू कर देंगी। जिससे अमेरिका को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है।


अगर बात प्रेसिडेंट ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करें तो दोनों की वेव लेंथ मिलती जुलती है ।प्रेसिडेंट ट्रंप ने अमेरिका में सत्ता पर आने के बाद कट्टर इस्लामिक विचारधारा की आलोचना करते हुए अमेरिका में आने वाले मुस्लिम देशों के नागरिकों को रोक दिया। शुरुआत में विरोध हुआ,लेकिन बाद में सहमति भी मिली। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शायद ऐसा ही कुछ करने के मंसूबे के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सफलता कितनी मिलती है वह तो आने वाला वक्त बताएगा,लेकिन शायद यही समानता मोदी और ट्रंप के बीच में दोस्ताना बढ़ा रही है, कि दोनों कड़े निर्णय लेने में हिचकते नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दो दिवसीय दौरे पर आ रहे हैं। ऐसे में कुछ लोग प्रेसिडेंट ट्रंप के स्वागत के पीछे जो खर्च हो रहा है, उस पर सवालिया निशान उठा रहे हैं,लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अगर आगे बढ़ना होगा,विश्व फलक पर अपना नाम मजबूत करना होगा, तो आंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे एक मजबूत दोस्त की जरूरत है और अगर वह अमेरिका बनता है तो हिंदुस्तान विश्व सत्ता पर काफी शक्तिशाली नजर आएगा। चीन के सामने भारत के साथ अगर अमेरिका खड़ा रहेगा तो भारत के लिए चीन से निपटना आसान होगा। भारत दौरे में ट्रंप भले ही अपना फायदा देख रहे हो,लेकिन हिंदुस्तान को ट्रंप के दोस्ताने में अपना फायदा जरूर ढूंढना चाहिए। ट्रंप भले ही अपने चुनाव प्रचार के लिए भारत आ रहे हो लेकिन भारत इस दौरे से कितना हासिल कर सकता है? विदेशी रणनीति तय करने वाले लोगों को यह जरूर सोचना चाहिए और शायद यह जरूर सोचा भी गया होगा। भारतीय होने के नाते हम तो यही आशा कर सकते हैं कि भारत देश अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के साथ हाथ मिलाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शक्ति को 4 गुना बढ़ाए।जिसका सीधा फायदा आने वाले दिनों में हिंदुस्तान को मिल सके।

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